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अन्तर्द्वन्द

नदी के किनारे एक पत्थर पर बैठकर तथा पॉव पानी मे डूबोऐ हुऐ , उसकी कल-कल बहती जलधारा को निहारते हुये बालक शान्त भाव मे मानो आत्म-मंथन मे डूबा हुआ प्रकृति के सौन्दर्यमयी स्वरूप को महसूस करने का प्रयास कर रहा हो । नदी की धारा एक विशाल पत्थर से टकराकर ऐक तालाब का निर्माण करती है जहां जल का प्रवाह बिलकुल शान्त हो जाता है । बालक कुछ कंकड़ लिये लगातार शॉन्त जल मे फेंकता है तथा उनसे उठने वाली तंरगो की तीव्रता को अपने पॉव तक महसूस करके ऐक अलग अनुभूति प्राप्त करता है । प्रत्येक कंकड़ से प्रतिकर्षित होने वाली ये तंरगे अपने केन्द्र से परतो मे व्यक्ति तक पहुँचती है । प्रकृति मानो स्वयं एक संदेश प्रसारित करने का प्रयत्न कर रही हो कि जीवन भी ऐक केन्द्र से शुरू होकर आगे बढ़ता हो तथा इन्ही तंरगो की भॉती बाल्यावस्था की चंचलता , युवावस्था की ऊर्जा ऐवम् अन्तिम क्षणो मे अनुभवों से परिपूर्ण किन्तु बिना ऊर्जा के, बिना तीव्रता के धीरे धीरे स्वतः ही विलुप्त हो जाता है । इस यात्रा मे अनुभवों का आधार , अर्जित किया विस्तृत दायरा अन्तिम तंरग की उपलब्धियों की व्याख्या करता हो । व्यक्ति समझता है अनुभव सर्वश्रेष्ठ अध्यापक है किन्तु अंतर्मन के इस द्वंद्व को देखकर दुखी होता है क्योंकि उसे महसूस होता है की ये ऊर्जामयी तरंगे तो अल्पकालिक है । उसके मस्तिष्क मे मानो युद्ध चल पड़ा हो वह अपनी तंरगो को कैसे व्यवस्थित करे यह प्रश्न कदाचित उचित था । कुछ देर बाद यह बालक घर की ओर प्रस्थान करता है , घर पंहुचते ही पुछता है कि मॉ सर्वाधिक प्रेम किससे करती है । मॉ हँसकर कहती है कि “अरे पगले तू ही तो मेरा सबकुछ है , मेने अपने जीवन मूल्यो को तुम्हें प्रदान करके अगली पीढ़ी के लिये संरक्षित किया है , मुझे इससे अधिक जीवन से और क्या चाहिए “। बालक बहुत प्रभावित ऐवम प्रसन्न होता है । भावुक होकर विचारो मे डूब जाता है कि धन्य है वो मॉ जिनके संस्कारों से साधारण मनुष्य ईश्वर हो गये । वह खुश था कि उसकी मॉ सदैव उसे सर्वाधिक प्रेम करने का एहसास दिलाती रहती थी ।

रात का खाना खाने के बाद रोज की तरह वह छत पर सोने चला गया । आज आकाश बिलकुल नीला ऐवम स्वछन्द था तथा हजारों टिमटिमाते तारे साफ देखे जा सकते थे । वह लेट गया ऐवम सितारों को निहारने लगा । ये टिमटिमाते सितारे मानो उसे बैचेन करने लगे , उसे उसके अस्तित्व के वर्चस्व का पाठ पड़ाने लगे हो । सितारों की इस भीड़ मे मानो वह कहीं खो सा गया हो , वह जहॉ भी देखता उसे स्वरूप नजर आ रहा था । वह महसूस करने लगा की वह विलुप्त हो रहा है तथा अन्य सितारे प्रकाशमय हो रहे हो । वह बैचेन होने लगा तथा ऐसा महसूस करने लगा की इस भीड़ मे तो उसका अस्तित्व ही नही । यह बेहद कठिन समय था । वह उठता है तथा टहलने लगता है । कुछ देर बाद उसे नींद आ जाती है । आज का युद्ध मानो समाप्त हो चुका हो । अगले दिन सूर्य की प्रथम किरण के साथ वह जागता है । वह बेहद प्रसन्न है क्योंकि सारा अंधकार समाप्त हो चुका है और जीवन मानो प्रकाशमय हो चुका है । उसे मानो इस अन्तर्द्वन्द से पाठ मिला हो कि जीवन मे कभी ज्यादा घमण्ड होने लगे तो स्वच्छ आकाश के नीचे लेटकर उस भीड़ मे अपने अस्तित्व को ढूँढना , घमण्ड स्वत: दूर हो जायेगा । तंरगो ने मानो जीवन की निश्चित यात्रा का पाठ सिखाया हो जिसके आधार पर वह अपनी ऊर्जा को व्यवस्थित कर सकता है । वह बेहद प्रसन्न था तथा प्रकृति के रहस्यमय सौन्दर्य को और विस्तृत समझना चाहता था । उसकी सिखने की ललक मानो हजारो गुना बड़ गयी हो । वह शिक्षित होकर आगे बढ़ना चाहता था तथा स्कूल जाकर अब ज्ञान अर्जित करना चाहता था । वह खिलखिलाकर मॉ से कहता है वह स्कूल जाना चाहता है । मॉ खुश थी तथा स्वीकृति देने के बाद बालक बेहद प्रसन्न था । मैं भी उस बालक को देखकर बेहद प्रसन्न हुआ ।

 

ठण्डी सर्द रातें रूह को कंपकपा देती है लेकिन स्वप्न ज्योति आज भी उसे खुले आकाश को निहारने हेतु आकर्षित करती है । मॉ ने चुल्हा फूकॉ , गर्म रोटियॉ सेक कर उसे आवाज लगायी किन्तु वह रोज की भॉति आज भी आकाश मे रहस्यो को निहारते हुये कहीं खो सा गया था । आखिर यह ब्रह्मांड है क्या ? उसकी उत्पत्ति से लेकर अन्तिम अवस्था तक के विचारो की उथल पुथल ने उसे मानो गहन चिन्तन मे डाल दिया हो जैसे । विचारो की उम्र नही होती , ये तो शून्य से उत्पन्न होकर , शून्य मे विलीन होते है । वह महसूस करता कि कितनी विचित्र बात है , रहस्यो का ये भण्डार मानो उसकी जिज्ञासा को सहस्र गति प्रदान करता हो । मॉ ने फिर आवाज लगायी , वह वापस जाता है खाना तैयार है और मॉ से पुछता है कि वह वहॉ तक यात्रा करना चाहता है जहॉ उसे ब्रह्मांड की अन्तिम अवस्था की प्राप्ति हो । मॉ मुस्कराते हुये कहती है जहॉ शिव शम्भू रहते हैं वही से सब शुरू होता है और वहीं समाप्त । मॉ उसकी उत्सुकता देखकर मुस्कराती है । वह गर्म गर्म रोटियॉ , सब्जी खाता है तथा रहस्यो का वार्तालाप जारी रहता है । गॉव मे बिजली की समस्या है , खाकर वह चिमनी वाला लैम्प जला देता है और कमरे मे जाकर टेबल पर रख देता है । वह अब कला की कॉपी निकाल कर पेंसिल से कुछ उकेरने की कोशिश करता है । कुछ देर बाद उसे नींद आने लगती है तो आधा अधुरा चित्र छोड़कर लैम्प बुझा देता है और लेट जाता है । मस्तिष्क मे अभी रहस्यो का युद्ध छुड़ा हुआ है , ये कल्पनाऐं उसे ऐक अलग आन्नद प्रदान करती थी । एक हिंदू परिवार मे होने के कारण वह धार्मिक गतिविधियों से भी अक्सर रूबरू हो जाया करता था । वह आश्चर्यचकित रहता था कि कैसे आस्थाओं का जन्म होता है । वह देवी देवताओं के अस्तित्व से भी अत्यंत प्रभावित था तथा उनके रहस्य उसे सदैव उत्साहित रखते थे ।

उसको नींद आ जाती है , मानो ऐक युद्ध की समाप्ति का विगुल बजा दिया गया हो किन्तु ऐक अलग काल्पनिक संसार मे वह अपनी रहस्यमयी खोजे जारी रखता है ।

वह घर से निकल पड़ा है , गॉव से काफी दूर जाकर वापस देखता है , धुमिल होती तस्वीर अभी दिखाई दे रही है । फिर मुड़कर सफर की गति को बरकरार रखता है । अब यहॉ से दुसरा गॉव शुरू होता है , चलते चलते कुछ लोग मिलते है किन्तु वह बिना किसी वार्तालाप के आगे बड़ता जाता है । किसकी तलाश और कौन सी वो मंजिल , अभी भी अस्पष्ट है । दिन समाप्त होता है वह चॉदनी रात मे भी यात्रा बरकरार रखता है । इसी तरह कुछ और गॉव पार करता रहता है तथा 2-4 दिन बीत जाते है । चेहरे पर प्रखर तेजस्वी ओज , प्रचण्ड जोश उसकी ऊर्जा को सदैव ज्वलित करता है तथा आगे बढ़ने की प्रेरणा देती रहती है ।

अब ऐक धार्मिक स्थल आता है जहॉ कुछेक श्रद्धालु दिखाई पड़ते है । ऐक साधू उसे बताते है यह रास्ता सीधेे कैलाश जाता है जहॉ स्वयं शिव शम्भू विराजमान है किन्तु इस राह पर कोई गया नही कभी । इतने दिनो के कठिन यात्रा उसे डगमगा नही पायी , अब तो मानो उसे शिव शम्भू की तलाश हो जैसे । उसकी राहे कितनी अलग है , वह किसी की परवाह किये वगैर आगे की ओर चल पड़ता है । इतने दिनो से कन्दमूल, फल फूलों जैसे प्राकृतिक स्रोतों से यापन करता रहा । कठिन मार्गों, नल नालो , नदि , जंगलों को पार करता रहा और अब बर्फ की चोटियों से रूबरू होता है । ये राह कितनी कठिन है किन्तु जिज्ञासा की हठ हार मानने से इनकार करती है । अब ये डगर और कठिन होने वाली थी वह इस बात से अनभिज्ञ था । ये बर्फ ढकी चोटियॉ और उनसे बहने वाली सर्द हवाऐं मानो तीखी तलवार सरिखे वार करती है । उसका जुनून आगे बढ़ने का हौसला देता है , रफ्तार थमती नही और वह बड़ता चला गया । वह ऐक चोटी पर पहुँच गया किन्तु उसे अब और ऊंची चोटियॉ दिखाई दे रही है , वह फिर आगे बड़ता है शिव शम्भू की तलाश मे ।

ऐक स्थान उसे महसूस होता है कि अब उसका शरीर साथ नही दे रहा , रुककर और ऊँची चोटियों को देखता है । उसकी ऑखो के सामने अब अंधेरा छा रहा है , वह घुटनो के बल बैठ जाता है । उसका शरीर ठण्डा पड़ने लगा , सॉसे थम सी रही थी । उसे प्रतीत होने लगा कि ये अन्तिम क्षण है , निराशा ने जकड़ सा लिया हो जैसे । उसे दुख है कि बिना दर्शन के छोड़कर जाना पड़ेगा । अचानक अंधेरा छा जाता है , वह गिर पड़ता है । शरीर गिरा पड़ा है , वह अंधकार मे विलीन हो गया । यही सत्य है , यह अंधकार है और इसके आगे कुछ नही है , यही शून्य है । वह कभी नही उठेगा ।

कुछ क्षण पश्चात ऐक तीव्र ज्योति प्रकट होती है , उसकी ऑखे खुलती है तो वह स्वयं को किसी की बॉहो मे पाता है । ये क्या ! साक्षात शिव शम्भू उसे उठाये हुये है । उनके तेज से मानो संसार प्रकाशित हो रहा हो जैसे । उनकी रहस्यमयी मुस्कान मानो सहस्र रहस्यों को जन्म दे रही हो जैसै । भोले बाबा मुस्कराये , वह कुछ नही बोल पाया । बाबा ने सिर पर हाथ फेरा , उसे ऐक झटका लगा उसने ऑखे खोल कर देखा मॉ सिर पर हाथ फेर रही थी । दूध का गिलास मेज पर रखा था , सुबह हो चुकी थी । वह मॉ से लिपट जाता है किन्तु कुछ कहता नही । मॉ हाथ फरती है और मुस्कराती है । ये रहस्यो के खजाने मे ऐक और हीरा इकट्ठा हो गया । मॉ तथा बालक दोनो बेहद प्रसन्न थे । मैं भी उन्हे देखकर बेहद प्रसन्न था ।

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मैं जाति हूँ (Castiesm )

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मैं जाति हूँ (Castiesm )

मैं ब्राह्मण हूँ , सर्वोच्च ज्ञानी हूँ वेदों का
भिक्षु हूँ लेकिन मालिक हू ईश्वर के निर्देशों का ।

कालान्तर में तुम सब मानव में , सर्वोच्च कहलाऊँगा
देवताओं से सीधे बात बस मैं ही कर पाऊँगा ।

तुम सब बलवानो को राजपाट का , सौभाग्य दिलवाऊँगा
कमज़ोरों से पूर्व जन्म के पापों को धुलवाऊंगा ।

मैं राजपूत हूँ , बस राजयोग ही पॉऊगा
राजा का बेटा हूँ तो बस राजा ही कहलाऊँगा ।

बुद्धी ना भी हो तो , ब्राह्मण मेरे दरबारी होगे
सेना होगी , नौकर होगे और मेरे व्यापारी होगे ।

कालान्तर मैं सदैव , यूं ही बलवान रहूँगा ,
बाहूबली व बलशाली वो राजपूत रहूँगा ।

मैं दलित हूँ , मैं ग़ुलाम हूँ जजमानो का
भोग रहा मैं दण्ड विधी का और पूर्व जन्म के पापों का ।

मैं अछूत हूँ , छाया का अभीशापी हूँ
मैं दलित हूँ , मैं नीच हूँ और सामाजिक पापी हूँ ।

मैं छू लू पत्थर के देवों को तो ,ये उनकी निन्दा है ।
क्योंकि मैं तो मृत हूँ और मेरे देव अभी भी ज़िन्दा है ।

कालान्तर मे मैं सदैव हक़ से वंचित हो जाऊँगा ,
हेय दृष्टि भावना लेकर सदैव अछूत कहलाऊँगॉ ।

 

 

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The Journey Begins

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Good company in a journey makes the way seem shorter. — Izaak Walton

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