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पहाड़ों का बचपन

 

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रात भर मीठी बारिश हो रखी है , आज खेतों की जुताई के लिये बडि़या दिन है , सुबह – सुबह राम के पिता ने राग अलापा । राम और श्याम दोनों भाई  सुबह जल्दी उठना पसन्द नहीं करते थे लेकिन उनकी मॉ भोर तले ही गाय दुहने चली जाती थी । गाय दूह कर वापस आकर कुछ दूध को बाल्टी मे डाल देती थी जिसकी दही जमाई जाती थी बाकि दिनचर्या मे आने वाले चायपान इत्यादि के लिये अलग रख देती थी । सुबह के चार साढ़े चार बजे रोज़ मॉ का यही काम था । पॉच बजे के क़रीब पिता जी भी उठ जाया करते थे और चाय बनाने मे लग जाते थे । पिता चाय बनाते थे तथा इतने मे मॉ जमाई गयी दही को लकड़ी की बनी ऐक हाण्डी मे डालकर मठ्ठा बनाने की तैय्यारी शुरू कर देती थी ।

दोनों लोग फिर चाय पीते और पता नहीं सुबह सुबह क्या बातचीत करते रहते , शायद उनके पास हज़ारों बातें थी जो वो हमेशा ऐक दूसरे से कहते रहते थे । इतना प्रेम था दोनों मे । फिर 6 बजे के क़रीब मॉ मठ्ठा बनाना शुरू कर देती , घिघरी की रस्सी बँधीं हुयी और फिर शुरू ….घर्र घर्र घर्र घर्र !

राम को इस आवाज़ से नफ़रत थी क्योंकि उसकी वो सपनों मे खोई हुयी नींद ख़राब हो जाती थी । लेकिन वो बिस्तर मे पड़ा ही रहता था उठता नहीं था और उसे देर तक सोना पंसद था । उसका भाई श्याम भी उतना ही आलसी था । लेकिन 6 बजे के क़रीब सुबह सुबह पिता आवाज़ लगाते है ,

“ओऐ ! उठ जाओ दोनों आज तीन दिन के बाद आसमान साफ़ हुआ है “

श्याम ने तुरन्त आवाज़ लगाई

“पापा जी आज मे डंगर (पशु) छोड़ने जंगल नहीं जाऊँगा , कल भी मैं ही गया था , आज भाई जी जायेगा “

 

और फिर क्या ! इसी बात पर दोनों भाइयों की लड़ाई शुरू ।

“क्यों मैंने नी छोड़े क्या दो दिन लगातार “ मैं नहीं जा रहा – राम बोला ।

पिता ने उसे चुप कराते हुये बोला अरे बेटा तू बड़ा है यहीं तो जाना है छोड़ दे फिर दोपहर तप जायेगी । गाय भूखे मर जायेगी अन्दर । श्याम तब तक बैलों को खेतों मे ले आयेगा आज मौसम अच्छा है ।

राम ने मुँह बनाया और उठकर रसोई मे घुस गया जहॉ उसकी माँ मठ्ठा बना रही थी । राम मुँह सिकोड़ कर बोला

“आमा जी , मैं नहीं जा रहा ….”

मॉ ने दुलारा और बोला कि

“बेटा चला जा , देख तेरे लिये मे ताज़ा मक्खन भी रखूँगी फिर “

बस राम यही तो चाहता था की उसको कुछ काम के बदले कुछ खास मिले ।वह भागा गोशाला की ओर , किवाड़ों को खोला और फिर 3-4 गाय 3-4 बछड़े , 2-4 जवान बैल जो अभी हल चलाने को तैयार नहीं थे । ऐक बैल की जोड़ी उसने नहीं खोली जो आज खेतों की जुताई करने वाली थी । श्याम और उसके पिता भी पहुँचे और दोनों बैलों को खोला खेतों की ओर ।

पिता बोले

“जल्दी जा बेटा और वापस आजा जल्दी , देखो लोगों ने तो दो दो बार खेतों की जुताई कर भी ली “

आज मौसम अच्छा था , स्वच्छ नीला गगन ऐवम पहाड़ों की चोटियों मे बर्फ़बारी पर पड़ने वाली सूर्य की रोशनी ऐकदम स्वर्णिम ! बेहद खुबसूरत दृश्य !

गॉव के सभी लोगों ने सुबह सुबह अपने बैलों की जोड़ियाँ खेतों मे पहुँचा दी थी और लाल , काले , सफ़ेद मज़बूत कन्धों वाले बैलों ने ऐक अलग समा बॉध दिया था ।

उधर राम अपने डंगर (पशु) लेकर चल पड़ा उनको जंगल की ओर छोड़ने । 7 बजे का वक़्त हो गया होगा , राम वापस आ गया आज वो पशुओं को ज़्यादा दूर नहीं छोड़कर गया बल्की नज़दीक ही छोड़कर भाग आया था । पशुओं को  उनको रास्ते  याद थे वो रोज़ एक ही रास्ते से जाते और शाम तक स्वयं ही वापस भी आ जाते थे बस कभी कभार नहीं आते थे तो उनको लेने भी जाना पड़ता था । फिर कई बार वो जल्दी भी वापस आ जाते थे और फिर दूसरों की फ़सलो को नुक़सान भी पहुँचाते थे , इसका भी ध्यान रखना पड़ता था । कई बार पशुओं के नुक़सान की बजे से लड़ाइयाँ तक हो जाती थी ।राम भागा भागा वापस आया , श्याम और उसके पिता ने तब तक बैलों को जोत के लिये तैयार कर रखा था । जैसे ही राम पहुँचा मॉ ने आवाज़ लगाई

“आजा बेटा ! पहले रोटी खा ले ठण्डी हो गयी फिर चले जाना “

श्याम और उसके पिता खा चुके थे । राम भागकर जल्दी से वापस आया क्योंकि उसे अपनी रिश्वत मक्खन का भी इंतज़ार था । वो रसोई मे घुसा मॉ ने कटोरी मे उसके लिये ताज़ा मक्खन रखा था और मक्का की रोटी बनी थी । ऐक दूध का गिलास और मक्खन लगी मक्के की रोटी ! वाह !

राम ख़ुश था उसे लगा की सिर्फ़ उसकी ख़ातिरदारी हो रही है लेकिन मॉ तो मॉ है , उसने श्याम के लिये भी उतना ही मक्खन रखा था लेकिन श्याम को बोला था कि वो राम को ना बताये वरना राम रूठ जायेगा  ।जल्दी से खाना खा कर फिर राम भी खेतों की ओर भाग गया । पिता ने ऐक खेत मे हल चला दिया था अब खरपतवार वग़ैरह के लिये वह जोल लगवाने के लिये तैयार थे । जोड़ लकड़ी का बना (सरावन /सरण जुते हुए खेत की मिट्टी बराबर करने का पाटा) ऐक यंत्र है जिसमे ऐक पकड़ने के लिये हैण्डल रहता है जो बीचों बीच रहता है । राम और श्याम दोनों बेहद ख़ुश थे की उनको मौक़ा मिलेगा बैठने का , जोल के ऊपर । यह किसी झूले झूलने से कम नहीं था ! हीरा और मोती बैलों की वो जोड़ी और जोल को खींचते हुये आगे बड़ते जाते , उस पर पिता ने अचानक उनको रोक दिया और बोले

“आ जाओ जल्दी ! बैठो “

राम व श्याम भागे और ऐक बॉयी ओर और ऐक दिया ओर । दोनों ने बैलों की पूँछ पकड़ी ओर बैल दनादन आगे बड़ते चले गये । राम और श्याम दोनों ख़ुशी से चिल्ला रहे थे , दोनों ज़ोर ज़ोर से हँस रहे थे और जब तक पूरा खेत समतल नंही हुआ दोनों ने ख़ूब मज़े किये । 8:30  बज गये थे , धूप लग चुकी थी और मॉ ने आवाज़ लगायी ।

“ओऐ ! आ जाओ अब , स्कूल के लिये देर हो जायेगी , पानी गरम कर रखा है नहा लो “

राम भागकर आया , नहाने चला गया । बहुत ख़ुश था क्योंकि आज उसने ख़ूब मस्ती की । 9:00  बज गयी , स्कूल की पहली घण्टी बज गयी । दोनों जल्दी से तैयार हो गये ताकि दूसरी घण्टी 9:30  से पहले स्कूल पहुँच जाये ।

कुछ ऐसा था वो पहाड़ों का बचपन , मैंने भी जिया है !जहॉ खिलौने रोबोट नहीं हमारे जीवन से जुड़े पहलू थे । खेतों की हरियाली और मिट्टी की सुगन्ध । जीवन मे सच्चाई , निर्मलता और बचपन का भोलापन सब बेहद हृदय स्पर्शी है । आज भी कभी ऑंखें बन्द करता हूँ तो याद आती है कि कैसे जीवन ज़्यादा सरल ऐवम खुबसूरत था जहॉ सॉसो को शुद्ध हवा , पीने को स्वच्छ जल मुफ़्त मे मिलता था । आज तो हवा भी पैसों से प्यूरीफाई कर रहे है , आरों से पानी ताकि जीवन का क्रम कुछ ज़्यादा दिनों तक बना रहे ! समय का चक्र है और यादों का सहारा , जो लिये जा रहा है ।

वो घाटी का बचपन और वो घाटी के वासी , दोनों मेरे हृदय के सबसे क़रीब पहलू है ।

 

 

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प्रश्न

“ प्रश्न “ – (The Question )

कुछअधुरे ख़्वाब तो होगें ?

कुछ अधुरे सवाल तो होगे ?

क्या है वो पल जिसके लिये तुम

सारा ज़मीं ऑसमा ऐक कर सकते हो ,

क्या है वो पल जिसके लिये तुम

हज़ार बार मर कर भी लड़ सकते हो !

सामने आइने के पुछ लो ये प्रश्न कि

क्या कर रहे और कहॉ जा रहे हो ?

मिल गये जबाब तो नये सवाल लो ,

ख़त्म है ख़्वाब तो नये ख़्वाब लो ..।।।

ग़लतियों मे सुधार की ज़मीं तलाश लो ,

निशब्द ख़्वाब के लिये फिर नयी मशाल लो ,

मैदान मे दृढ़ संकल्प लो इस जंग का ,

नया रंग रक्त का और हृदय उंमग का ,

तप की स्याही से श्रम की लेखनी तक ,

सफल हुये हर ख़्वाब की हर कहानी तक ,

पुछते चलो बस पुछते चलो ,

हर दफ़ा उस आइने से ये प्रश्न पुछते चलो !

क्या है वो पल जिसके लिये तुम

सारा जमी ऑसमा ऐक कर सकते हो …..।

…….हज़ार बार मरकर भी लढ़ सकते हो …।।।

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A White Horse (story of a time)

(यह ऐक छोटी सी कहानी है जो बहुत वर्षों पहले मेरे ऐक दोस्त ने मुझे सुनाई थी । वर्षों तक ज़ेहन मे रहने के बाद इस कहानी को आप सभी तक पहुँचा रहा हूँ । उम्मीद करूँगा की इसका असर आपको इसे और आगे पहुँचाने को मजबूर करेगा )

राम ऐक छोटे से क़सबे में रहता था जो कि देहरादून से लगभग 200km दूर यमुना घाटी के की तलहटी में बसा है । चारों और सुन्दर पर्वत और इसकी घाटी मे बहती निरन्तर दो नदियों कि जलधारा और स्वर्ग सा बसा ये बेहतरीन क़स्बा ।

यहॉ के लोग तेज़ तर्रार किन्तु सुविधाओं से वंचित है फिर भी हिम्मत ना हारने वाले मेहनती है । राम ऐक 12 वर्ष का मेधावी ऐवम जिज्ञासु लड़का है जो अपने मासूमियत से भरपूर उड़दंगो से ना केवल अपने माता पिता अपितु गली मोहल्लों को तक को ख़ूब परेशान रखता था ।

ये क़स्बा टौंस नदि की तलहटी मे बसा है तथा राष्ट्रीय राजमार्ग इसको हिमाचल ऐवम उत्तराखण्ड से जोड़ता है । वाहनों की आवाजाही लगी रहती है जिसके चलते छोटी सी मार्केट मे काफ़ी लोगों को रोज़गार भी मिलता है ।

इसी रास्ते के चलते वन गुर्जर अपने मवेशियों के साथ गर्मीयो के शुरू होते ही मैदानों से ऊँचे पहाड़ों की ओर चलते है तथा बर्फ़बारी से पहले ही फिर इसी रास्ते मैदानों की ओर पलायन करते है ।

इनके पशुओं की संख्या काफ़ी होती है तथा इसमें गाय , भैंसे , बकरियाँ और घोड़े प्रमुख होते है । अभी गर्मियाँ शुरू हो चली थी स्कूल अब बन्द थे और राम प्रत्येक दिन अपने मित्रों के साथ नदी मे नहाने चला जाता था । वन गुर्जरों का आना शुरू हो चला था और राम और उसके साथी छोटी नदी मे इन पशुओं को ख़ूब परेशान करते थे । वो कभी बकरियों के बच्चों के पीछे भागते तो कभी पानी मे नहा रही भैंसों को नहलाते । हर दिन इसी तरह मौज मस्ती मे बीत जाता ।

4-5 दिनों के बाद एक वन गुर्जर का झुण्ड आया जिसमें बकरियाँ और घोड़ों की संख्या ज़्यादा थी । राम, मृनल , सत्यानंद और उसके कुछ साथी आज भी घर से खाना खाकर खड़ी धूप मे नदी किनारे पड़ी पानी की छाबर बना कर उसमे लोटपोट आराम फ़रमा रहे थे तभी इस झुण्ड ने उनकी इस अय्याशी मे बाधा डाली । इन गुर्जरों से यहॉ के मूल बाशिन्दें कभी गाय ,भैंस , बकरीयॉ और घोड़े इत्यादि उचित दामों मे ख़रीद लिया करते थे । इस घोड़ों के झुण्ड मे तो ऐक से बड़कर ऐक घोड़े थे और इनमें से सबसे ख़ूबसूरत था ऐक सफ़ेद जवान घोड़ा जो अभी भरपूर जवान भी नहीं हुआ था लेकिन उसके सफ़ेद मखमली बाल उसकी गर्दन से ऐसे लहराते मानो परियों ने मोतियों की मालाओं को ऐक साथ जोड़ दिया हो , उसके खुर्रो मे भी लम्बे बालों का ऐक गुच्छा था तथा इस घोड़े को देखकर राम और उसके साथी मानो ख़ुशियों कि चौकड़ी भर रहे थे ।

सत्यानंद ऐवम मृणाल क़स्बे के काफ़ी अमीर परिवारों से आते थे ऐवम इनके परिवारों मे पहले से घोड़े मौजूद थे ।उन दिनों पशुधन सम्पदा परिवार की शान थी और परिवार की हैसियत दूध-दही-घृत माखन मेवा से ही की जाती थी ।राम तो ऐक ग़रीब परिवार से था हालाँकि राम अपने मित्रों मे सर्वाधिक बुद्धिमान ऐवम तेजस्वी था लेकिन जब भी वो लोग अपने घोड़ों के बारे मे बात करते तो वो चुप हो जाता ।उसकी भी जिज्ञासा जाग जाती की मेरे पास भी ऐक घोड़ा होता तो मैं भी कुछ हेकड़ी दिखा पाता और इतना ख़ूबसूरत घोड़ा तो किसी ने पहले कभी देखा ही नहीं । दिन भर इन लोगों ने नदी के किनारे ख़ूब मस्ती की और दिन भर घोड़ों के नामो पर चर्चा की । कोई चेतक कहता तो कोई कुछ ।

राम ने मन ही मन सोचा की क्यों ना इस घोड़े को ख़रीदा जाये । राम जिज्ञासापूर्ण घोड़े के मालिक के लड़के सलीम के पास गया जिसने उस वक़्त घोड़े को पकड़ रखा था । राम ने सलीम को पूछा “भाई कितने का है ये घोड़ा “

सलीम – चार हज़ार का ।

चार हज़ार उन दिनों बड़ी रक़म मानी जाती थी और राम ने चार हज़ार कभी सोचे भी नहीं थे देखना तो बहुत दूर की बात थी और वह हक़ीक़त जानता था यहॉ तक कि राम कभी कभी स्कूल तक नहीं जाता था क्योंकि उसके पिता स्कूल की फ़ीस भी कई बार टाईम से नहीं दे पाते थे जो कि मात्र पचास रूपया प्रति माह होती थी । राम मन ही मन बेहद निराश था लेकिन उसने इस शिकन को चेहरे पर प्रतीत नहीं होने दिया । सब मित्र बेहद ख़ुशी ख़ुशी घर चले गये ।

घर पंहचते ही राम ने अपने पिता से पूछा –

“बाबा घोड़ा घिनी ला , होद्द एसो

बाठकुणा “

(बाबा क्या आप मेरे लिये घोड़ा ख़रीदेंगे बेहद ख़ूबसूरत है )

इस पर पिता मुस्कराहट के साथ पुछते है ।

“कैथा ओसो ऐ , आमारे कैथुके रोआ लागी घोड़ा “

(कहॉ है , और हमारे किस काम का है घोड़ा )

“गुजरो केंई ओसो है , ला बाबा इनी केईं बाद्दे केईं है घोड़ा , आमे भी उण्डा घीनु ले “

(गुर्जर के पास है बाबा , इन सब लोगों के पास घोड़ा है हम भी ख़रीदते है ना बाबा )

“बाबा – केतरे का लाई देई “

(कितने का दे रहे है ?)

राम – चोऊ हजारो का

(चार हज़ार का )

बाबा – बेटा रूपये ने बेटा रूपये ने ओथी ।

(बेटा पैसे नहीं है )

राम – उण्डा घिनुले ला बाबा हद्द ओसो बोडिया घोड़ा ।

(बाबा ख़रीद लो ना बहुत अच्छा घोड़ा है )

बाबा – रूपये ने ओथी बेटा हेभी , हेभी ने घिनीओन्दा ।

(पैसे नहीं है बेटा अभी , अभी हम नहीं ख़रीद पायेंगे )

राम – तुमे बोलो ऐश्नो ही , तुमे ने कोदी ने घिन्दे ।

(आप तो हमेशा ऐसे ही बोलते हो , कभी नहीं ख़रीदते हो )

इन्हीं शब्दों के साथ मानो उसके सपने चूर हो गये हो , ऑसुओ की जलधारा प्रवाहित हो चली लेकिन पिता तो असहाय है कर भी क्या सकते थे सिवाय इसके कि वो बोलते है कि जब पैसे होगे तो ले लेंगे । वह फूट फूट कर रोने लगा जैसे उसके सारे सपने यहीं ख़त्म हो गये हों , जैसे उसका जीवन ही व्यर्थ चला गया हो कि वो आख़िर पैदा ही क्यों हुआ !

लेकिन पिता ने उसे रोने दिया वो जानते थे कि दर्द क्या है क्योंकि उनके संघर्षों ने , जीवन के कटु अनुभवो ने उन्हें ज़ख़्मों के अलावा कभी कुछ दिया ही नहीं ।

ऐक नयी सुबह होती है लेकिन राम अभी भी नाराज़ है रात का खाना भी नहीं खाया है हालाँकि सलीम और उसका जादुई खुर्रो वाला घोड़ा भोर कि पहली पहर मे ही कूच कर गये है ऊचें पहाड़ों की ओर जहॉ उसको अपने मवेशियों के लिये हरी हरी घास पर्याप्त मात्रा मे मिलेगी । राम बहुत नाराज़ है उसके बाबा उसको मनाने का प्रयत्न करते रहते है । 1-2 दिन बाद फिर उसकी बंदमाशियो भरी ज़िन्दगी होती है अब वह सब कुछ भूल गया है। मानो कोई घोड़ा उसकी ज़िन्दगी मे था ही नहीं ।

इस साल राम मेधावी होने के चलते नवोदय विद्यालय के प्रवेश परिक्षा मे सलेक्ट हो जाता है और अब वह 6-12 तक की पडाई वही करेगा ।उसके साथ साथ सत्यानंद व मृणाल भी चयनित होते है ।सब के सब गॉव से बेहद दूर उत्तरकाशी चले जाते है ।

चार साल बाद उसकी दसवीं की परिक्षाऐ सम्पन्न होती है उसके परिणाम आने तक वह अपने मित्रों के साथ गॉव वापस आया है । दसवीं का परिणाम आता है वह प्रथम श्रेणी मे उत्तीर्ण हुआ है और उसके सब मित्रों मे सबसे अधिक अंक है ।

मई माह का प्रथम सप्ताह है वन गुर्जरो का आना जाना फिर से शुरू हो चला है । बचपन की भॉती अभी भी सब दोस्त दिन मे खाना खाने के बाद नदी मे नहाने चले जाते है । और वो लोग देखते है सलीम और उसके मवेशियों का झुण्ड फिर से आया है । वही घोड़ा जो चार साल पहले उन्होंने देखा था आज भी है लेकिन ज़्यादा मज़बूत , ज़्यादा जवान और ज़्यादा ख़ूबसूरत । किसी दोस्त को ये नहीं मालूम था की राम उस घोड़े को कितना चाहता था । सलीम भी अब काफ़ी जवान दिख रहा था लेकिन सलीम के दो बच्चे भी हो गये थे हालाँकि वह राम से 3-4 साल ही बड़ा होगा । राम जिज्ञासा से पुछता है कि क्या उसने उसे पहचाना ।

सलीम मना करता है और कहता है कि उसे याद नहीं है । राम फिर भी उसको सारी बात बताता है और कहता है कि चार साल पहले तुमने इस घोड़े की किन्तु चार हज़ार बोली थी ।

राम फिर क़ीमत पुछता है ?

सलीम जो पहले से ही थका हारा है थोड़ा झल्लाकर अब क़ीमत चालीस हज़ार कहता है । ख़ैर सायंकाल होते ही सब वापस घर की ओर चल देते है । घूमफिर कर रात को घर मे खाना खाते वह पिता को कहता है |

राम – जुणजा सैजा घोड़ा ओसो था ने मुऐ तोदी ला था बोली ! ऐबे ओसो चालीश हज़ारों का और तोदी ओसो था चोऊ हज़ारों का ।

(बाबा जो मैं वो घोड़ा कह रहा था ना , वो अब चालीस हज़ार का है और उस वक़्त चार हज़ार का था )

बाबा ने कुछ नहीं कहा । राम की आवाज़ मे वो मर्म सुनाई पड़ा जो इतने वर्षों तक भी उसके हृदय मे कही ना कही दफ़्न था । कुछ देर तक ख़ामोशी छायी रही

उसके बाबा रात को खाना खाने के बाद ही सलीम से मिलने चले गये और उनको बोल दिया कि सुबह थोड़ा रूक कर जाना ।

राम ख़ुशी से उठता है और बाबा चालीस हज़ार रूपये उसके हाथ मे थमा देते है और दोनों घोड़ा लेने बाज़ार जाते है । लोगों की भीड़ जमा होती है सब लोग घोड़े की तारीफ़ कर रहे है । राम बेहद ख़ुश था । उसके बाबा चाहते तो कुछ पैसे कम भी करवा सकते थे लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा ।

इसकी मन मे सदैव जिज्ञासा बनी रहेगी कि बाबा ने ऐसा क्यों किया ?

लेकिन राम तो इतना ख़ुश पहले कभी नहीं था शायद ये उसकी ज़िन्दगी का सबसे बेहतरीन पल था मानो ज़िन्दगी ने उसके आगे हार मान ली हो और वह उसे सब कुछ देना चाहती हो । राम की ख़ुशी की कल्पना शब्दों मे ब्यॉन नहीं की जा सकेगी कि वह कैसा महसूस कर रहा था लेकिन उसके सपनों का सफ़ेद घोड़ा उसे मिल गया था ।

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उड़ान

उड़ान – ललित हिनरेक

तुम equality कि बात करते हो

तुम revolution कि बात करते हो

तुम देशभक्ति कि बात करते हो

और तुम बदलाव कि बात करते हो

यहॉ तक कि तुम विकास की बात करते हो

वो भी तब जब तुम सब सुविधा से संचित हो ।

मैंने क्या देखा कि तुमने तो बस पाले बदले ,

कपड़े बदले , खोल बदला और बस घोटाले बदले ।

ये वो है जो जिनके मॉ बाप ने दिहाडी मज़दूरी की है ,

ये वो है चन्द पैसों नो जिनकी सारी ख़्वाहिश पूरी की है ।

तुम देखना जब ये बदलेंगे तो वो revolution होगी ,

जिसकी तुमने कपट इरादों से कभी पुरजोर वकालत की थी ।

तुम देखना इनके सपनों से ही ख़ुशहाली आयेगी ,

जो तुम्हारी उस equality की लढियॉ लगाएगी ।

जिसकी रोशनी से जगमग ना सिर्फ़ ऐक घर होगा बल्कि

वो भी होगें जिनके सपनों मे घनघोर अंधेरे नज़र आते है ।

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दोस्ती (A little story of friendship )

मैंने इंजीनियरिंग में कुछ नहीं सीखा जिसका मुझे ताउम्र मलाल रहेगा । मैं और मेरे कुछ मित्र अपनी ब्रांच में सबसे कम मार्क्स लाने वालों में से थे और उनमें भी मैं लगभग सबसे पीछे था , ऐक आध ही मुझसे पीछे रहता होगा ।
मेरे दोस्तों में कई बेहद प्रतिभाशाली थे लेकिन उनके मार्क्स नहीं आते थे क्योंकि वो भी कोई दिलचस्पी नहीं लेते थे पढ़ाई लिखाई में ।

मुझे पास कराने में तो मेरे दोस्तों का ख़ासा रोल रहा है । वो रात भर ऐक ऐक यूनिट पड़ते थे फिर प्रत्येक दो घण्टे में मुझे भी पढ़ाते थे । इसमें मेरी ब्रांच के मोहित, रितेश , किशन , गैरी और सूरज थे । इन सभी से परे मेरे बेस्ट फ़्रेण्ड निशान्त का रोल सबसे अधिक रहा । मुझे लगता है उसको इलेक्ट्रानिक्स से ज़्यादा शायद इलेक्ट्रिकल का नॉलेज हो गया होगा । ये सब के सब बैक बैंकर्स विद बैक थे और मैं शायद इनमें टाप था । हालत ये थी कि कभी कभी ऐसा लगता था कि बमुश्किल है कि चार साल में ही डिग्री मिल जायेगी ।
हज़ारों वाक्ये है जो मेरी दोस्ती की कहानियों
में शुमार है ।
मैं कॉलेज ऐक्टाविटीज में बहुत कम इन्वालव रहता था जिसके कारण मुझे प्रत्येक सेमेस्टर में ऐक आध सब्जेक्ट में डिबार्ड होना पड़ता था । यहॉ तक कि 3rd सेमेस्टर से 6th सेमेस्टर तक टोटल बैक सात हो गयी थी । 6th सेमेस्टर के मध्य में यूनिवर्सिटी ने नया रूल लागू किया कि जिसकी भी चार से ज़्यादा बैक है वो सातवें सेमेस्टर नहीं भेजा जायेगा और उसकी ईयर बैक लग जायेगी । अब मेरे जैसे सैकड़ों की तो हालत ख़राब थी । दोस्त इतने कमीने थे सब जिनकी चार से कम बैक थी वो आ आ कर बोलते थे कोई नहीं भाई तू जूनियर मत समझना अपने को , भाई है तू अपना ।
मेरे सारे इंजीनियरिंग का लेखाजोखा या तो निशान्त देखता था या फिर मेरी ब्रांच के दोस्त । सितम्बर में डेट आ गयी थी । एग्ज़ाम पौड़ी गडवाल में होने थे । मेरे दोस्तों ने मुझे भी इन्फ़ॉर्म कर दिया कि तेरा पहला पेपर EMMI का है 15 सितम्बर को । मैंने नोट्स बनाना शुरू किया और थोड़ा पड़ना भी । पौड़ी  160 किलोमीटर दूर है देहरादून से !
सुबह चार बजे उठकर रिस्पना पुल जाना पड़ता था और वहाँ से टैक्सी पकड़कर पौड़ी जाना पड़ता था । निशान्त मुझे सुबह चार बजे उठकर लेने आता था और फिर बाईक में रिस्पना छोड़ता था ।
अब पहले पेपर का दिन भी आ गया । 15 सितम्बर को पौड़ी पहुँचकर अपने दोस्त कुमार सौरव के यहाँ रूका वह वहॉ के कॉलेज से ही इंजीनियरिंग कर रहा था । पेपर सेकेण्ड शिफ़्ट में था तो लन्च करके ,नहा धोकर और विशेषकर प्रार्थना कर एग्ज़ाम देने पंहुचा । टाईम हो गया था सब स्टूडेण्ट्स अन्दर चले गये और मैं अभी भी अपना नाम और पेपर का शेड्यूल ढूँढ रहा था । जब सब अन्दर चले गये तो और प्रोफ़ेसर ने मुझे देखा और पुछा कि कौन सा सब्जेक्ट है ?
मैंने दबी आवाज़ में कहा कि EMMI सर ।
उनने थोड़ा खिझते हुये कहा कि EMMI का तो पेपर ही नहीं है आज । क्या करते हो देख के नहीं आते , जाओ यहॉ से ! प्रोफ़ेसर चिल्लाये ।
मैं दबे पॉव खिसका मन ही मन सब दोस्तों को गाली दे रहा था वापस आते ही सबसे पहले डेट शीट देखी तो पता चला मेरा एग्ज़ाम 15 अक्टूबर को था और इन दोस्तों ने मुझे ऐक महीना पहले भेज रखा था ।
अब बहुत हँसता हू इन सब बातों को लेकर क्या दिन थे वो भी । हॉ ! मेरा वो एग्ज़ाम क्लीयर हो गया था , वो ही नहीं बल्की सभी सातों बैक उसी एक सेमेस्टर में । ये लेवल था मेरा और मेरे बैकबैंचर्स दोस्तों का ।
नेक्स्ट ईयर फ़ाइनल ईयर था । आठवें सेमेस्टर में तो सिर्फ़ एक महीना ही क्लास चली और सात फ़रवरी को लाल्टू दिन था । अब डायरेक्टर प्रैक्टीकल देने आना था । सात फ़रवरी शाम को फ़ेसबुक पर निशान्त का और मैसेज आया जो इस प्रकार था I

7.2.2012 9:46pm
भाई कितनी बातें ऐसी होती है जो मैं किसी को कह नहीं पाता और ना कभी कह पॉऊगॉ पर उसके लिये हम कुछ कर नहीं सकते हमें वो जैसा बनाता है वैसे बन जाते है मगर मैं जैसा था और जैसा हूं उसमें सबसे ज़्यादा क्न्ट्रीब्यूशन तेरा है मैं अपनी लाईफ़ में कुछ भी करूँ या ना कर पाऊँ पर तूने मेरे लिये जितना किया है शायद ही कोई किसी के लिये करेगा मैं हमेशा यही सोचता हूँ कि पता नहीं कौन से कर्म होगे मेरे ,जो मुझे तेरे जैसा दोस्त मिला अगर तू ना होता तो मैं शायद लाईफ़ का मतलब ही नहीं समझ पाता ,कुत्ते जैसी ज़िन्दगी तो कोई भी जी ले पर जो हमें अलग बनाते है वो होते है हमारे दोस्त , जो हम पर जान छिड़कते है
बस इतना कहना है कि चाहे तू जहाँ भी जाये कभी भी अपने आप को अकेले मत समझना कोई हो ना हो पर ऐसा दिन नहीं आएगा जिस दिन मैं तेरे साथ नहीं होऊँगा अभी भी ऐसा दिन नहीं कि तेरे बारे में ना सोचूँ और वैसे भी तू दुनिया मे अकेले है जो मुझे सबसे ज़्यादा जानता है हम सब के पास कुछ ना कुछ होता है लेकिन ऊपर वाले ने तुझे कुछ ज़्यादा ही टेलेण्ट दे के भेजा है और चाहे तुझे अपने आप पर इतना यक़ीन हो ना हो मगर जो भी तुझे अच्छे से जानता है उसे पता है कि तू क्या करने का जज़्बा रखता है
तो भाई तुझे कभी भी अपनी क़ाबिलियत पे थोड़ा सा भी शक हो तो मेरा ये मैसेज पड़ना और याद करना की मुझे तुझ पर कितना विश्वास है आगे हमें भी पता है कि हमारी लाईफ़ चेन्ज होने वाली है पर तू बिलकुल मत बदलना और इससे कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता कि तू आगे जा के कुछ करे ना करे बस कोशिश ज़रूर करना और किसी भी चीज़ की चीज़ की टेन्शन मत लेना मिल के दुनिया की मॉ चो* देगें

शायद ये पिछले दो दशकों से , जब से होश संभाला है किसी ने मेरे लिये सबसे बेहतरीन शब्द कहे है ।
जब भी कभी महसूस किया कि मैं क्या हूँ हमेशा इस मैसेज ने मुझे मेरे अच्छे होने का अहसास कराया है ।इंजीनियरिंग भले ही ना सीख पाये लेकिन दोस्ती सीख गये और मुझे हैरानी होती है कि मेरे सारे बैक बैंचर्स आज बेहतरीन जगहों पर है ।

आज के दौर पर जहाँ लोग अच्छे आवरण रूपी खोल धारण कर समाज में अपनी अच्छाई , दोस्तरूपी शुभचिन्तक के इरादे के ढोल पीटते है लेकिन अन्दर से उनका खोखलापन कभी ना कभी , किसी ना किसी रूप में जगज़ाहिर हो जाता है । मैं भाग्यशाली हूँ और मुझे अपने उन सभी लोगों पर गर्व है जिनका मेरे जीवन में कुछ ना कुछ सरोकार रहा है ।

आप भी उन लोगों को याद करिये जिनका आपके जीवन में अमूल्य योगदान है , ये वही लोग है जिनको आप धन दौलत से ख़रीद सकते ।

 

I have been so lucky to have great people in my life that had supported me in all the way. This was a small incident in my life but it delivers a great message. I hope you all will count all those people who have somehow contributed in your life directly or indirectly. Do not lose your good friends ever because they are rare. May be one day it is too late and your will realize that you had lost a diamond while you are busy with collecting stones.

Thank you.